• पातंजलयोगसूत्र में अधिगम की अवधारणा


    शषिकान्त मणि त्रिपाठी, डाॅ. उपेन्द्र बाबू खत्री, डाॅ. अखिलेष कुमार सिंह, डाॅ. शाम गणपत तीख


    Designation : पी.एच.डी. साँची बौध्द्ध भारतीय ज्ञान अध्ययन विष्वविद्यालय, रायसेन, (म.प्र.)


    Journal Name : Reserach maGma




    Abstract :
    भारतीय दर्षन परंपरा में अधिगम का संबंध अंतरात्मा के ज्ञान से है। योगदर्षन महर्षि पतंजलि द्वारा विरचित एक महत्वपूर्ण ग्रंथ है। जिसमें अधिगम प्रक्रिया का वर्णन आया है। ईष्वर की भक्ति से अंतरात्मा अधिगम सरलता से किया जा सकता है।ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावष्च।। अंतरात्मा का ज्ञान ही योग साधना का परम लक्ष्य है। पुरूषार्थ चतुष्टय् में मोक्ष की प्राप्ति परम पुरूषार्थ है। मनुष्य के जन्म मुख्य लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति है। जो योग के माध्यम से सम्भव है। महर्षि पतंजलि के अनुसार योग चिावृिायों का निरोध है। योगष्चिावृिा निरोधः।। इस योग से द्रष्टा को अपने स्वरूप का बोध होता है। द्रष्टा और दृष्य के योाग से सृष्टि होती है। अविद्या का जन्म भी इसी के परिणाम स्वरूप होता है। अविद्या क्लेषों का मूल है, जिससे मुक्त होने के लिये जीव जीवन भर प्रयास करता है। योग विद्या से अविद्या जनित अधिगम से निवृिा होती है। यौगिक अधिगम का लक्ष्य द्रष्टा का दृष्य से वियोग है। जिसके पष्चात् साधक को अपने शुद्ध चैतन्य आनंद स्वरूप का ज्ञान होता है। प्रस्तुत शोध-पत्र में यौगिक अधिगम के बारे में वर्णन किया गया है। जीव के दुःख की आत्यान्तिक निवृिा अपने स्वरूप बोध के पष्चात् ही होती है। द्रष्टा जब दृष्य से मुक्त होता है, तब अपने स्वरूप में स्थित होता है। द्रष्टा का स्वरूपाधिगम ही योग है। यह योग विद्या ही द्रष्ट-दृष्य संयोग से उत्पन्न अविद्यादि पंच क्लेषों से मुक्ति दिलाती है। जो मुक्ति दिलाए उसे विद्या कहते है। सा विद्या या विमुक्तये अर्थात विद्या वह है, जो मुक्ति प्रदान करें।


    Keywords :
    अधिगम, योगसाधना, विद्या-अविद्या, योगसूत्र, ईष्वरप्रणधान।


    Reference :
    1.योगसूत्र (1/2) 2.योगसूत्र (1/3) 3.ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावष्च।। 4.योगसूत्र (2/28) 5.योगसूत्र (1/2 एवं 3)

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