• लोक साहित्य में जन-जीवन


    डाॅ0 रागिनी राय


    Designation : अध्यक्ष, हिन्दी विभाग, अखिलभाग्य पी0जी0 काॅलेज, रानापार, गोरखपुर।


    Journal Name : Reserach maGma




    Abstract :
    लोक साहित्य उस निर्मल दर्पण के समान है जिसमें जनता जनार्दन का अखिल तथा विराट स्वरूप पूर्णरूपेण दिखाई पड़ता है। लोक संस्कृति का जैसा दिव्य तथा अकृत्रिम प्रतिबिम्ब इस साहित्य में उपलब्ध होता है उसका दर्शन अन्यत्र कहाँ। जनसाहित्य की निर्मल निर्झरिणी में अवगाहन कर केवल शरीर ही पवित्र नहीं होता प्रत्युत आत्मा भी पूत और पावन बन जाती है।


    Keywords :
    लोक साहित्य, जन-जीवन


    Reference :
    1. डाॅ0 कृष्णदेव उपाध्याय लोकसाहित्य की भूमिका पृ0-271 2. जनपद खण्ड-1, अंक-1, पृष्ठ-71 लोकसाहित्य का अध्ययन। 3. मैक्सिम गोर्की व्यक्तित्व का विनाश, पृष्ठ-1908 4. सर जार्ज ए ग्रियर्सनः द साॅग्स आफ मानिकचन्दः जर्नल आफ दि रायल एशियाटिक सोसाइटी आफ बंगाल: संख्या-3, सन् 1878 ई0 5. वही: ऐन इंट्रोडक्शन टू दि मैथिली लैंगवेज आफ नार्थ बिहार, कन्टेनिंग ए ग्रामर केस्टोमैथी एण्ड वोकेब्युलरी: जर्नल आफ रा0ए0सो0 आफ बंगाल, भाग-1, 1880 ई0 और भाग1, 1882 ई0।

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